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कर्णवेध मुहूर्त 2019

Last Updated: 10/31/2018 12:20:32 PM

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कर्णवेध संस्कार का हिन्दू धर्म में हमेशा से ही विशेष महत्व रहा है। भारत मान्यताओं का और संस्कारों का देश है। वैदिक हिंदू धर्म में कुल मिलाकर 16 संस्कार मुख्य रूप से माने गए हैं जिन्हें षोडश संस्कार के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी संस्कार मानव जीवन पर अमिट छाप डालते हैं। इन्ही संस्कारों में से एक है कर्णवेध संस्कार, जो मनुष्य के सुखी और सार्थक जीवन को सुनिश्चित करता है। इस संस्कार को कुछ लोग कान/कर्ण छेदन संस्कार के नाम से भी जानते हैं।

कर्णवेध मुहूर्त 2019
दिनांक वार तिथि नक्षत्र समय
02 जनवरी 2019 बुधवार द्वादशी विशाखा नक्षत्र 10:20 - 13 :13 14 :48 - 18 :58
03 जनवरी 2019 गुरुवार त्रयोदशी अनुराधा नक्षत्र 08 :34 - 11 :44
09 जनवरी 2019 बुधवार तृतीया धनिष्ठा नक्षत्र 07 :46 - 09 :53 11 :20 - 16 :16
13 जनवरी 2019 रविवार सप्तमी उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र 14 :05 - 18 :15
14 जनवरी 2019 सोमवार अष्टमी रेवती नक्षत्र 15 :56 - 18 :11
18 जनवरी 2019 शुक्रवार द्वादशी रोहिणी नक्षत्र 13 :45 - 15 :41 17 :55 - 19 :55
19 जनवरी 2019 शनिवार त्रयोदशी मृगशिरा नक्षत्र 07 :46 - 10 :41
21 जनवरी 2019 सोमवार पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र 07 :45 - 11 :58 13 :33 - 20 :04
25 जनवरी 2019 शुक्रवार पंंचमी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 17 :28 - 18 :48
26 जनवरी 2019 शनिवार षष्टी हस्ता नक्षत्र 07 :43 - 08 :46 10 :13 - 15 :09
27 जनवरी 2019 रविवार सप्तमी चित्रा नक्षत्र 07 :43 - 10 :10 11 :34 - 15 :05
30 जनवरी 2019 बुधवार दशमी अनुराधा नक्षत्र 17 :08 - 19 :28
06 फरवरी 2019 बुधवार द्वितीया धनिष्ठा नक्षत्र 07 :38 - 09 :30
10 फरवरी 2019 रविवार पंंचमी रेवती नक्षत्र 07 :35 - 10 :39 12 :15 - 18 :45
11 फरवरी 2019 सोमवार षष्टी अश्विनी नक्षत्र 07 :43 - 12 :11 14 :06 - 18 :41
15 फरवरी 2019 शुक्रवार दशमी मृगशिरा नक्षत्र 08 :55 - 16 :05
17 फरवरी 2019 रविवार द्वादशी पुनर्वसू नक्षत्र 07 :29 - 08 :47 10 :12 - 18 :17
23 फरवरी 2019 शनिवार चतुर्थी चित्रा नक्षत्र 09 :48 - 15 :34 17 :54 - 19 :36
03 मार्च 2019 रविवार द्वादशी उत्तराषाढ़ा नक्षत्र 10 :52 - 12 :48 15 :02 - 19 :40
04 मार्च 2019 सोमवार त्रयोदशी श्रवण नक्षत्र 07 :48 - 12 :44 14 :58 - 17 :19
09 मार्च 2019 शनिवार तृतीया रेवती नक्षत्र 07 :28 - 08 :53 10 :28 - 16 :59
21 मार्च 2019 गुरुवार पूर्णिमा उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 16 :12 - 18 :29
22 मार्च 2019 शुक्रवार द्वितीया हस्ता नक्षत्र 06 :54 - 11 :33 13 :47 - 18 :25
23 मार्च 2019 शनिवार तृतीया चित्रा नक्षत्र 07 :58 - 11 :29
25 मार्च 2019 सोमवार पंंचमी विशाखा नक्षत्र 07 :32 - 07 :50 09 :26 - 15 :56
31 मार्च 2019 रविवार एकादशी श्रवण नक्षत्र 07 :27 - 10 :57 13 :12 - 19 :16
01 अप्रैल 2019 सोमवार द्वादशी धनिष्ठा नक्षत्र 07 :23 - 13 :08 15 :28 - 19 :53
05 अप्रैल 2019 शुक्रवार पूर्णिमा उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र 17 :30 - 19 :46
06 अप्रैल 2019 शनिवार प्रतिपदा रेवती नक्षत्र 10 :34 - 17 :26
07 अप्रैल 2019 रविवार द्वितीया अश्विनी नक्षत्र 06 :59 - 08 :34
10 अप्रैल 2019 बुधवार पंंचमी रोहिणी नक्षत्र 12 :33 - 19 :27
11 अप्रैल 2019 गुरुवार षष्टी मृगशिरा नक्षत्र 06 :43 - 12 :29
13 अप्रैल 2019 शनिवार अष्टमी पुनर्वसू नक्षत्र 08 :11 - 12 :21
19 अप्रैल 2019 शुक्रवार पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र 06 :31 - 11 :57 14 :18 - 18 :51
27 अप्रैल 2019 शनिवार अष्टमी श्रवण नक्षत्र 07 :16 - 09 :11 11 :26 - 18 :20
2 मई 2019 गुरुवार त्रयोदशी उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र 15 :44 - 20 :20
9 मई 2019 गुरुवार पंंचमी आर्द्रा नक्षत्र 17 :33 - 19 :29
10 मई 2019 शुक्रवार षष्टी पुनर्वसू नक्षत्र 06 :25 - 11 :55 15 :12 - 19 :35
11 मई 2019 शनिवार सप्तमी पुष्य नक्षत्र 06 :21 - 12 :51
15 मई 2019 बुधवार एकादशी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 12 :35 - 17 :09
16 मई 2019 गुरुवार द्वादशी हस्ता नक्षत्र 06 :11 - 07 :57 10 :11 - 17 :05
19 मई 2019 रविवार प्रतिपदा अनुराधा नक्षत्र 07 :45 - 12 :20 14 :37 - 19 :13
24 मई 2019 शुक्रवार षष्टी उत्तराषाढ़ा नक्षत्र 09 :40 - 16 :34
26 मई 2019 रविवार सप्तमी धनिष्ठा नक्षत्र 07 :17 - 09 :32 11 :52 - 14 :09
30 मई 2019 गुरुवार एकादशी रेवती नक्षत्र 07 :02 - 11 :36 13 :54 - 18 :30
31 मई 2019 शुक्रवार द्वादशी अश्विनी नक्षत्र 06 :58 - 13 :50 16 :06 - 18 :26
06 जून 2019 गुरुवार तृतीया पुनर्वसू नक्षत्र 06 :34 - 08 :49
07 जून 2019 शुक्रवार चतुर्थी पुष्य नक्षत्र 08 :45 - 11 :05 13 :22 :18 :57
12 जून 2019 बुधवार दशमी हस्ता नक्षत्र 08 :25 - 15 :19 17 :38 - 18 :57
15 जून 2019 शनिवार त्रयोदशी विशाखा नक्षत्र 12 :51 - 15 :07
22 जून 2019 शनिवार पंंचमी धनिष्ठा नक्षत्र 07 :46 - 16 :59
27 जून 2019 गुरुवार नवमी रेवती नक्षत्र 07 :26 - 12 :04 14 :20 - 18 :45
28 जून 2019 शुक्रवार दशमी अश्विनी नक्षत्र 07 :22 - 09 :42
03 जुलाई 2019 बुधवार प्रतिपदा आर्द्रा नक्षत्र 09 :23 - 16 :16
04 जुलाई 2019 गुरुवार द्वितीया पुष्य नक्षत्र 06 :59 - 09 :19 11 :36 - 18 :31
13 जुलाई 2019 शनिवार द्वादशी अनुराधा नक्षत्र 06 :23 - 08 :43 11 :01 - 17 :55
19 जुलाई 2019 शुक्रवार द्वितीया धनिष्ठा नक्षत्र 07 :25 - 12 :53 15 :13 - 19 :36
24 जुलाई 2019 बुधवार सप्तमी रेवती नक्षत्र 06 :09 - 08 :00 10 :18 - 18 :35
25 जुलाई 2019 गुरुवार अष्टमी अश्विनी नक्षत्र 07 :17 - 10 :14 12 :30 - 18 :08
29 जुलाई 2019 सोमवार द्वादशी मृगशिरा नक्षत्र 07 :41 - 14 :34 16 :52 - 18 :51
01 अगस्त 2019 गुरुवार पूर्णिमा पुष्य नक्षत्र 09 :46 - 14 :22
05 अगस्त 2019 सोमवार पंंचमी हस्ता नक्षत्र 07 :13 - 11 :47 14 :06 - 18 :29
09 अगस्त 2019 शुक्रवार नवमी अनुराधा नक्षत्र 11 :31 - 16 :09
15 अगस्त 2019 गुरुवार पूर्णिमा श्रवण नक्षत्र 06 :34 - 11 :07 13 :27 - 18 :29
16 अगस्त 2019 शुक्रवार प्रतिपदा धनिष्ठा नक्षत्र 07 :39 - 13 :23
21 अगस्त 2019 बुधवार षष्टी अश्विनी नक्षत्र 06 :24 - 08 :27 10 :44 - 17 :26
25 अगस्त 2019 रविवार नवमी मृगशिरा नक्षत्र 12 :48 - 18 :52
28 अगस्त 2019 बुधवार त्रयोदशी पुष्य नक्षत्र 08 :00 - 14 :54 16 :58 - 18 :41
1 सितम्बर 2019 रविवार द्वितीया उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 12 :20 - 18 :25
5 सितम्बर 2019 गुरुवार सप्तमी अनुराधा नक्षत्र 17 :28 - 14 :23 16 :27 - 18 :09
11 सितम्बर 2019 बुधवार त्रयोदशी श्रवण नक्षत्र 07 :05 - 09 :21 11 :41 - 17 :46
29 सितम्बर 2019 रविवार प्रतिपदा हस्ता नक्षत्र 06 :44 - 08 :10 10 :30 - 16 :35 18 :02 - 19 :27
30 सितम्बर 2019 सोमवार द्वितीया चित्रा नक्षत्र 06 :58 - 10 :26 12 :45 - 17 :58
2 अक्टूबर 2019 बुधवार चतुर्थी विशाखा नक्षत्र 14 :41 - 19 :15
3 अक्टूबर 2019 गुरुवार पंंचमी अनुराधा नक्षत्र 06 :46 - 12 :33
13 अक्टूबर 2019 रविवार पूर्णिमा उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र 15 :40 - 18 :32
14 अक्टूबर 2019 सोमवार प्रतिपदा रेवती नक्षत्र 17 :11 - 13 :54 15 :36 - 18 :28
19 अक्टूबर 2019 शनिवार पंंचमी मृगशिरा नक्षत्र 06 :55 - 09 :11 11 :30 - 16 :44
21 अक्टूबर 2019 सोमवार सप्तमी पुनर्वसू नक्षत्र 07 :14 - 09 :03 11 :22 - 18 :01
26 अक्टूबर 2019 शनिवार त्रयोदशी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 11 :02 - 14 :49 16 :16 - 17 :41
30 अक्टूबर 2019 बुधवार तृतीया अनुराधा नक्षत्र 07 :02 - 10 :47 12 :51 - 17 :25
4 नवंबर 2019 सोमवार अष्टमी श्रवण नक्षत्र 17 :06 - 1841
10 नवंबर 2019 रविवार त्रयोदशी रेवती नक्षत्र 07 :45 - 10 :03 12 :07 - 16 :42
15 नवंबर 2019 शुक्रवार तृतीया मृगशिरा नक्षत्र 07 :25 - 09 :44
17 नवंबर 2019 रविवार पंंचमी पुनर्वसू नक्षत्र 09 :36 - 14 :50 16 :15 - 18 :52
18 नवंबर 2019 सोमवार षष्टी पुष्य नक्षत्र 07 :17 - 09 :32 11 :36 - 16 :11
22 नवंबर 2019 शुक्रवार दशमी उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र 17 :30 - 19 :26
23 नवंबर 2019 शनिवार द्वादशी हस्ता नक्षत्र 07 :21 - 12 :59 14 :26 - 19 :22
24 नवंबर 2019 रविवार त्रयोदशी चित्रा नक्षत्र 09 :08 - 14 :22
27 नवंबर 2019 बुधवार प्रतिपदा अनुराधा नक्षत्र 07 :24 - 08 :57
01 दिसंबर 2019 रविवार पंंचमी उत्तराषाढ़ा नक्षत्र 10 :45 - 12 :27 13 :55 - 18 :50
02 दिसंबर 2019 सोमवार षष्टी श्रवण नक्षत्र 07 :28 - 12 :23 13 :51 - 18 :46
07 दिसंबर 2019 शनिवार एकादशी रेवती नक्षत्र 07 :32 - 08 :17 10 :21 - 14 :56 16 :31 - 18 :27
08 दिसंबर 2019 रविवार एकादशी अश्विनी नक्षत्र 12 :00 - 16 :27
12 दिसंबर 2019 गुरुवार पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र 07 :35 - 11 :44 13 :11 - 18 :07
14 दिसंबर 2019 शनिवार द्वितीया पुनर्वसू नक्षत्र 07 :50 - 13 :04 14 :28 - 20 :14
29 दिसंबर 2019 रविवार तृतीया श्रवण नक्षत्र 07 :44 - 10 :37 12 :05 - 13 :29
30 दिसंबर 2019 सोमवार चतुर्थी धनिष्ठा नक्षत्र 15 :01 - 19 :11

भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्व

भारतीय हिन्दू समाज में आदिकाल से ही विभिन्न प्रकार के संस्कारों का बहुत महत्व रहा है। शुरुआत में संस्कार चालीस प्रकार के थे, जो समय के साथ-साथ क्रमश:/कम होते गए और आखिरकार आज सोलह संस्कारों को ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इनमें गर्भाधान संस्कार सबसे पहला और मृत्यु के बाद किया जाने वाला अंतिम संस्कार, आखिरी माना जाता है। मानव जीवन को हर स्तर पर बेहतर बनाने के लिए ही इन संस्कारों को निर्मित किया गया। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार पर बनाये गए ये संस्कार आज भी प्रासंगिक हैं।

कर्णवेध मुहूर्त की उपयोगिता

पुराने जमाने में कर्णछेदन करवाना सभी के लिए अनिवार्य था, ऐसे में ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेधन चाँदी की सुई से और क्षत्रिय और समृद्ध लोगों का कर्णवेधन सोने की सुई से और शूद्र का कर्णवेधन लोहे की सुई से किया जाता था। आजकल नाक-कान छिदवाने का काम मशीन से भी किया जाता है, जो पहले की अपेक्षा सरल और जल्दी हो जाता है। कर्णवेध संस्कार का महत्व इस बात से आँका जा सकता है कि पुराने ज़माने में यह भी माना जाता था कि जिस व्यक्ति का कर्णवेधन संस्कार नहीं हुआ हो, वह अपने किसी भी प्रियजन की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार करने का भी अधिकारी नहीं माना जाता था।

कर्णवेध मुहूर्त का ज्योतिषीय महत्व

  • कर्णवेधन हिन्दू धर्म में वर्णित सोलह संस्कारों में से एक है। कर्णवेधन का अर्थ है ' कानों को छेदना।
  • कर्णवेधन संस्कार में बालक के कानों को हिन्दू विधि द्वारा छेदा जाता है।
  • कानों में छेद करने का आधार पूरी तरह वैज्ञानिक है क्योंकि ये माना गया हैं कि ऐसा करने से बालक की सुनने की शक्ति बेहतर होती है और साथ ही बालक का बौद्धिक विकास भलीभांति होता है और उसका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।
  • कानों में छेद होने से कुण्डल आदि आभूषण पहनना सौंदर्य में भी वृद्धि करता है।
  • पुराने ज़माने में पुरुष भी कानों में कुण्डल आदि आभूषण पहना करते थे और आज भी यह फैशन का पर्याय माना जाता है।
  • कानों की नसों को ठीक रखने के लिए कानों में छेद करके सोने का आभूषण पहनाया जाता है।
  • ऐसा भी माना जाता है कि सूर्य की किरणें बालक या बालिका के कानों के छेद पर पड़कर उन्हें तेज संपन्न बनाती हैं।
  • माना गया है कि कान छिदवाने से हिस्टीरिया और लकवा जैसे गंभीर रोगों से भी रक्षा होती है।
  • लड़कियों के लिए कान छिदवाना विशेष रूप से जरुरी माना गया है।
  • कान के साथ-साथ नाक भी छिदवाने से मस्तिष्क के दोनों भाग विद्युत के प्रभाव से पूरी तरह सक्रिय हो जाते हैं, साथ ही नाक और कान में सोने के आभूषण पहनने से सर्दी-खाँसी जैसे रोग होने की संभावना कम हो जाती है।
  • इस संस्कार को करने से बालिकाओं और महिलाओं का मासिकधर्म चक्र भी नियमित रहता है।

कर्णवेधन मुहूर्त कब करें ?

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार कर्णवेधन करने का सही समय बालक के जन्म के तीसरे या पाँचवें वर्ष में है, लेकिन आजकल लोग कभी भी और कहीं भी कान छिदवा लेते हैं, जबकि वास्तव में ऐसा करना उचित नहीं है। कोई भी शुभ कार्य करने से पहले शुभ मुहूर्त जरूर निकाला जाता है, ताकि शुभ समय का अधिकाधिक लाभ उठाया जा सके। कर्णवेधन संस्कार भी मुहूर्त निकलवाकर ही किया जाना चाहिए क्योंकि सही समय पर कर्णवेधन करना, शरीर के साथ-साथ भविष्य के लिए भी अच्छा होता है। इसके अतिरिक्त अपने कुल गुरु, कुल पुरोहित अथवा अपनी वंश परंपरा के अनुसार आप किसी तीर्थ स्थल पर, मंगल कार्यों के अवसर पर तथा विभिन्न पर्वों पर चंद्र, ताल एवं लगन बल का विचार करके भी कर्णवेध संस्कार संपन्न कर सकते हैं।

कर्णवेधन मुहूर्त की गणना

  • कान छिदवाना एक शुभ कार्य है, इसलिए इसे किसी योग्य और अनुभवी ज्योतिषी द्वारा शुभ मुहूर्त निकलवाकर ही किया जाना चाहिए।
  • वैसे हिन्दू पंचाग के अनुसार कर्णवेधन संस्कार चातुर्मास में करवाना उचित समझा जाता है।
  • साथ ही कान छिदवाते समय यदि तुला, वृषभ, धनु आदि लग्न में बृहस्पति उपस्थित हों तो कर्णवेधन संस्कार के लिए यह शुभ अवसर माना जाता है।
  • कर्णवेधन के लिए सोमवार,बुधवार,बृहस्पतिवार और शुक्रवार का दिन शुभ माना जाता है।

कर्णवेधन करवाते समय ध्यान रखें ये सावधानियाँ

कान छिदवाने के कई लाभ हैं, लेकिन कान छिदवाने से सम्बंधित कुछ सावधानियां भी हैं, जिनका ध्यान रखा जाना चाहिए:

  • कर्णवेधन संस्कार क्षय तिथि, हरिशयन, खर मास आदि में नहीं करवाना चाहिए।
  • अमावस्या के दिन भी कर्णवेधन संस्कार न करवाएं।
  • कान बच्चे का छिदवाना हो या किसी बड़े का, कान हमेशा किसी योग्य और अनुभवी व्यक्ति से ही छिदवाएँ।
  • कान छिदवाते समय शाँत बैठें, हिलने-डुलने से कान गलत छिद सकता है।
  • छोटे बच्चों के कान छिदवाते समय विशेष ध्यान रखें कि वे बार-बार कान न छुएं और न ही खुजाएँ।
  • कान छिदवाने से पहले कान की त्वचा को अच्छी तरह से साफ़ करके साफ़ तौलिये से अच्छी तरह से पौंछ लें।
  • कान यदि सुई से छिदवा रहे हैं, तो सुई गर्म पानी या डेटॉल से अच्छी तरह से धो लेनी चाहिए ताकि किसी भी तरह के संक्रमण से बचा जा सके।
  • मशीन से कान या नाक छिदवाने पर भी उपरोक्त बातों का ध्यान रखें।
  • कान छिदवाने के बाद कान में सोने की बाली या टॉप्स ही डालें, कान में सोना पहनना कई बीमारियों से भी बचाता है।
  • कान में आर्टिफिशियल और भारी-भरकम आभूषण पहनने से बचें।
  • कान छिदवाने के बाद उसे पानी से बचाएं, पानी से संक्रमण जल्दी फ़ैल सकता है।
  • बाली या कुण्डल ऐसे पहनें, जिनमें कपड़ा उलझें नहीं।
  • यदि किसी वजह से कान का छेद पक जाए तो उसपर हल्दी लगाएं।
  • कानों को छूने से पहले हाथ साफ़ करके सुखा लें।

हिन्दू धर्म का कोई भी संस्कार अकारण ही नहीं बनाया गया है। हर संस्कार अपना एक विशेष महत्व रखता है और हर संस्कार के पीछे हमारे पूर्वजों की सटीक और वैज्ञानिक सोच है। कर्णवेधन या कान छिदवाना आज के समय में एक फैशन स्टेटमेंट बन गया है। कई लोग जिनमें लड़के और लड़कियाँ दोनों ही शामिल हैं, अपने कान कई जगह से छिदवा लेते हैं और उसमें तरह-तरह की ज्यूलरी पहनना पसंद करते हैं, लेकिन असल में यह ठीक नहीं है। सही तरीके से और शुभ समय में कान छिदवाना जहाँ कई शारीरिक व्याधियों से बचाता है और बुद्धिमत्ता को बढ़ाता है, वहीं असमय और मनचाहे तरीके से कान छिदवाना कई परेशानियो का कारण भी बन सकता है। इसलिए कर्णवेधन का महत्व समझें और इसे नियमानुसार ही करवाएं।

हम आशा करते हैं कि कर्णवेध संस्कार के बारे में हमारा लेख काफी हद तक आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा और इसके माध्यम से आप कर्णवेध संस्कार को सही मुहूर्त में करवा कर विभिन्न प्रकार की परेशानियों से बचेंगे और जीवन में उन्नति करेंगे।

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